बीज ने, चीरा है खुद को तब कहीं अंकुर बना है मृदा ने, चीरा है खुद को तब कहीं पौधा जना है। . लौ ने, चीरा है हवा को, तब कहीं उजाला हुआ है उजाले ने, चीरा अंधेरा तब कहीं सवेरा हुआ है । . व्योम ने, चीरा है दामन तब कहीं द्युति चमचमाई द्युति […]
Write, Read, Illustrate, To Educate
ज़रा लंबी विषय वस्तु है इत्मीनान से पढ़िएगा। मैं उस वर्ग का हिस्सा नहीं हूँ पर मुझे ‘मैं’ रूप में स्थापित करने में इस वर्ग के विभिन्न लोगों ने अनेक रिश्तों के रूप में मेरी मदद की है। बस ये एक उलझन जो मैं महसूस कर पाई हूँ अपने साथी वर्ग की। _______________________________________________________________________________________________________________ माना मेरे […]
राहों पे मिलते शजर ने कहा है, जाना यूँ तेरा, क्या अलविदा है? फिर मेरे लबों की तबस्सुम ने बोला, मौन ने मन की बातों को खोला, तेरी जड़ों से बनकर, डालों पे पली हूँ, बयारों के संग संग पत्तों सी चली हूँ, तूने ही मुझको खिलाया गुलों सा, तेरे नूर से ही बहारे हैं […]
कोई वक़्त तकता, कोई पहर देखता है, मेरा दिल वो सूखा शजर देखता है है शुकराना उन बेज़ुबाँ पंछियों को, सूखी डालों का भी, रहा ख़्याल जिनको बाक़ि ये ज़माना है मशगूल ख़ुद में, कोई इधर देखता है, कोई उधर देखता है, मेरा दिल वो सूखा शजर देखता है… तकते हैं उसकी जानिब, कई लोग […]
क्यों शाखें छोडकर, परिंदे सभी घर गए, करके सूनी टहनियाँ, पत्ते भी सारे झर गए, ये बयार, ये बहार, चंद पल को साथ थीं, बस जड़ों के उलझाव थे, जो दुखों को हर गए, पूछा न उस शजर से, बढकर कभी किसी ने, उस डाल के परिंदों के, बोलो कहाँ पर गए, जिसने जड़ें थीं […]
किसी विचार की सही तार्किकता तब जान पाओगे, उसके बनने की परिस्थितियाँ जब पहचान जाओगे। © Nikki Mahar | WriteSide
कहने वालों ने बहुत कुछ कहा, पढ़ने वालों ने तरह तरह के तर्क पाए। महसूसने की उस बात को अनगिनत तरीकों से गद्य में पढ़ा गया। हर बार निराली ही तर्ज़ पर कविताओं में गढ़ा गया। याद है ना? एक कवि ने सबसे बुरा ‘जाने की क्रिया को बताया’ तो दूसरे ने ‘ हमारे सपनों […]