शुभाशीष (सत्र 2025-26)
बीते कुछ दिनों से, या यूँ कहूँ कि कुछ महीनों से, एक अलग तरह की उधेड़बुन में आसपास के साथियों और मित्रों को देख रही हूँ। कारण? कारण यह कि उनके बच्चे इस साल ‘बोर्ड्स’ देंगे। लाज़िमी भी है अभिभावकों का यूँ फिक्रमंद होना या बेहतरी की दुआएँ करना, क्योंकि हमारी दुनिया का तानाबाना ऐसा ही बुना हुआ है।
इसके इतर, इन कुछ महीनों में बच्चे मुझसे और ज़्यादा बात करने लगे। अब रोज़ नहीं मिल पाते हम, इसलिए कभी ये बताते हैं कि एडमिट कार्ड मिल गया, कभी आपकी याद आ रही है, कभी आज लास्ट डे था, आज स्क्रिबलिंग डे मनाया, आप कब मिलोगे… और भी बहुत कुछ साझा करते हैं, जो यहाँ लिख नहीं सकती… मुझे ये सब बहुत सहज लगा, पर परसों जब अपने पढाए बैच की स्क्रिबलिंग डे और विद्यालय के आख़िरी दिन की तस्वीरें देखीं तो वाकई मेरी आँखें नम हुईं…अपने दिन भी याद आए।

मैं ये सोचकर उनके मन पढने की कोशिश कर रही थी कि एक तरफ परीक्षाओं का तनाव होगा, तैयारी की चिंता होगी, खुद पर शंका और विश्वास साथ-साथ हो रहा होगा, घरवालों की इच्छाएँ भी होंगी ये सोचकर मन भारी न भी हो उनका, पर ज़िम्मेदारी से भरा तो ज़रूर होगा… इस सब के बीच बचपन के दोस्तों से दूर होना, स्कूल से दूर होना (सब कुछ पसंद भले न हो, पर बहुत कुछ है स्कूल का जो जीवन भर याद रहता है—कुछ यादें, कुछ दोस्त, कुछ रिहर्सल्स, कुछ उपलब्धियाँ और शायद कुछ टीचर्स भी)… कितनी ही उथल-पुथल मन में चल रही होगी इस समय… जो दिखती नहीं है, जो सबसे कही भी नहीं जाती…
तो आज, परीक्षाओं से अधिक, इस उथल-पुथल के बारे में मेरे बच्चों के नाम—
देखो! ये सच है कि ऐसा हर दौर के हर बैच के साथ होता रहा है, पर इसका ये कतई मतलब नहीं कि आपकी भावनाएँ, आपका इस वक़्त ऐसा सोचना या ऐसा महसूस करना ग़लत या कमतर है। मगर ये भी याद रखो कि जो जुड़ने के लिए बने होते हैं—वो दोस्त हों, रिश्ते हों, यादें हों, साथ हो या जगहें हों—वे हमेशा जुड़ी ही रहती हैं।
आगे जीवन और भी व्यस्तताओं से भरेगा। ऐसा लगेगा कि सब बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है। अपने छूट जाने का डर भी सताएगा, पर जो है, जिस वक़्त है, अगर उस वक़्त उस पर ध्यान देकर उसे.. ‘केवल उसे’ सँवारने पर ध्यान दोगे, तो तुम ज़रूर पाओगे कि मुट्ठी भींचकर जो न पकड़ा गया, सहजता से समेटा जा सकता है…
ये मैं सिर्फ शिक्षक होने के अनुभव से नहीं लिख रही बल्कि इस नज़रिए के आधार पर लिख रही हूँ जब मैं भी साल 2008 में इन्हीं भावनाओं और मनःस्थितियों से गुज़र रही थी। मैं भी नहीं कह सकी थी ये घर पर, क्योंकि पेपर के आगे कुछ देखना-सुनना गँवारा ही कहाँ होता था तब किसी को… ये मानती हूँ मैं कि आपके दौर में अलग चुनौतियाँ हैं, पर यदि ‘बातचीत’ के पैमाने पर आँको तो…बहुत हद तक अभिभावक उतने दूर नहीं हैं, जितने पहले हुआ करते थे और सच कहें तो शिक्षक भी (सभी न भी हों परन्तु अधिक प्रतिशत है)।

मेरे पढाए विद्यार्थियों में से मैंने कई बड़े ग्रुप वाले दोस्तों को आज भी, सालों बाद भी, मिलते-जुलते देखा है। अधिक, कम और औसत अंक—तीनों ही प्रकार के बच्चों को बेहतर करते देखा है । नौकरी या व्यापार में उलझते-परेशान होते भी देखा है और व्यस्तताओं के बीच अपने सुकून (पैशन) को ज़िंदा रखते भी देखा है। बहुत ख़ुशी होती है ये देखकर कि बाहर निकल सकें हैं अपने उस डर से वे।
आपके लिए भी यही कहूँगी कि केवल परीक्षाएँ और परिणाम आपकी समर्थता को साबित नहीं करते। केवल एक काग़ज़ का टुकड़ा, जिसे बायो-डाटा कहते हैं, आपके हुनर, आपके कौशल, आपकी मेहनत की गवाही नहीं दे सकता… वो किसी ने कहा है कि—
डिग्रियाँ तो महज़ तालीम के खर्चों की रसीदें हैं, इल्म तो वही है जो किरदार में झलकता है।
वक़्त लगेगा व्यवस्थाओं को पूरी तरह बदलने में, समाज को बदलने में, आपके-मेरे अभिभावकों को बदलने में, हमें बदलने में और आपको बदलने में… मगर हर दौर में यह सच रहा है कि ‘वर्तमान’ पर ध्यान, खुद पर भरोसा, मेहनत का हाथ थामकर बिना किसी तुलना के, खुद से बेहतरी के प्रयास… हमें कामयाब ज़रूर बनाते हैं।
छद्म दुनिया के दिखावे के लिए न तो केवल अंकों के प्रति सनक रखो और न ही बेबुनियादी तर्कों के कारण उनकी अवहेलना करो।
मेहनत करो, खुद पर विश्वास रखो और देखना—परीक्षा के सफ़ेद सफ़हों (पन्नों) पर ही नहीं, बल्कि ज़िंदगी के अनुभवों पर भी आप कामयाबी की इबारत लिख सकोगे…अपने मन को इतना प्रयासरत रखें कि आप भी खुद में बाक़ी रहें, आपकी मासूमियत बची रहे और आप हर दिन, हर कदम स्वयं से बेहतर हो पाएँ।
शकील आज़मी नाम के शायर ने कहा है—
अपनी मंज़िल पे पहुँचना भी, खड़े रहना भी,
कितना मुश्किल है बड़े हो के बड़े रहना भी।
ईश्वर से प्रार्थना है कि आप सभी इस ‘बड़े होने’ को बचा सकें, कायम रख सकें… शीश अर्श पर और कदम फ़र्श पर रखने की इच्छा और हुनर—दोनों आपके व्यवहार में ताउम्र शामिल रहें…

आगामी परीक्षाओं के लिए शुभाशीष, मेरे बच्चो!
– आपकी टीचर